शबे बरात की फ़ज़ीलत
*🍀शबे बरात की फ़ज़ीलत🍀*
*शबे बरात का हलवा*
📌इस मुबारक रात को फातिहा के लिए हलवा भी बनाया जाता है जिस पर कुछ लोग तरह तरह के एतराज़ भी करते हैं। शबे बरात के मौके पर हलवा बनाना न तो फ़र्ज़ है। न वाजिब है और न ही नाजायज़ है न हराम है बल्कि सच्ची बात यह है कि शबे बरात में दूसरे तमाम हलाल खानों की तरह हलवा बनाना भी एक जाईज़ और मुबाह काम है। और अगर नेक नियत के साथ हो कि एक उम्दा और अच्छा खाना फकीरो और मिसकीनों और अपने अहल व अयाल को खिला कर सवाब हासिल करें और रिशतेदारों को भेजकर तोहफा देने सिला रेहमी करने का सवाब हासिल करें तो यह खैर और सवाब का काम है और शरअन हरगिज़ मना नहीं बल्कि अच्छा और पसन्दीदा है।
*◆ दरअसल शबे बरात पर हलवे का दसतूर इसलिए हुआ कि यह मुबारक रात सदका, खैरात ईसाले सवाब और सिला रहमी की खास रात है और इन्सान कि फितरत है कि खास खास मौके पर ख़ास और बहुत अच्छा खाना तैयार किया जाता है और المؤمن حلو ويحب الحلواء मोमिन हलावत और मिठास वाला है और मिठास को पसन्द करता है। यह बात ज़ाहिर है कि फ़ातिहा आमतौर पर शीरीनी पर कराई जाती है लिहाज़ा मुसलमानों में फातिहा के लिए हलवा पकाने का दसतूर (चलन) हो गया फिर अवाम अहले सुन्नत अपने बुजुर्ग आलिमों वलियो का तरीका अपनाते हैं !*
◆ आलिमो की नज़र में बुख़ारी शरीफ़ की हदीस आई كان رسول الله صلى الله عليه وسلم يحب الحلواء والعسل *यानी रसूले पाक ﷺ हलवा (शीरीनी) और शहद पसन्द फरमाते थे। इन उलेमाकिराम ने इस हदीस पर अमल करते हुए इस रात को फातिहा के लिए हलवा पकाया और आम मुसलमानों में रफता रफता इस का चलन हो गया। जो काम शरियत में मना न हो मुबाह हो और अल्लाह तआला के मोमिन बन्दे उसे पसन्द करें अल्लाह पाक भी उसको पसन्द फरमाता है।*
◆ हदीस पाक है ما راه المومنون حسنا فھو عند الله حسن जिसे मोमिन अच्छा समझे वह अल्लाह के नज़दीक अच्छा है। और फातिहा ईसाले सवाब अच्छे बढ़िया खाने पर मुसलमान हर ज़माने में पसन्द करते आये हैं। तो यह अमल अच्छा है।
◆ हज़रत शाह अब्दुल अज़ीज़ मुहद्दिस देहलवी रहमतुल्ला अलयह के मलफूज़ात (इरशादात) में है कि हिन्दुस्तान में शबे बरात पर रोटी और हल्वे पर फातिहा दिलाने का चलन है और समरकन्द व बुख़ारा में कतलिमा पर जो एक मीठा खाना है।
*◆ अल हासिल शबे बरात का हलवा हो या ईद की सिवईयाँ और शीर खुरमा या मुहर्रम शरीफ़ में आशूरा का खिचड़ा हो या मलीदा सिर्फ एक दस्तूर है और नेक नियत की वजह से खैर और सवाब का काम है बुजुर्गाने दीन का पसंदीदा काम होने की वजह इन्दल्लाह भी पसन्दीदा है और मुसतहसन व मन्दूब और तरीक-ए-महबूब है।*
◆ कोई सुन्नी मुसलमान न फ़र्ज़ जानता है न वाजिब लेकिन बिना वजह किसी चीज या किसी अमल को नाजायज़ व हराम कहना और मना इनकार करना गुलू करना और हद से बढ़ना है जो सख्त हराम है
अल्लाह तआला के किसी हलाल को हराम ठहराना अल्लाह तआला पर तोहमत लगाना है जो सख्त हराम और बदतरीन गुनाह है !
*◆ कुरान पाक (पारा ग्यारह सूरह यूनुस आयत 59) में अल्लाह तआला इरशाद फरमाता है।*
◆ *तरजुमा : आप फरमाइये भला बताओ तो वह जो अल्लाह ने तम्हारे लिए रिज़्क़ उतारा उसे तुमने अपनी तरफ से हराम और हलाल ठहरा लिया आप फरमाइये क्या अल्लाह ने तुम्हे इसकी इजाजत दी या अल्लाह पर झूठ बांधते हो।
★ मालूम हुआ कि अल्लाह तआला की हलाल चीज़ों को हराम समझना भी गुमराही और हराम चीज़ो को हलाल समझना भी गुमराही है।
◆ लिहाज़ा मीलाद शरीफ ग्यारहवीं शरीफ और बुजुर्गों की फातिहा वगैराह को बिना दलील शरई हराम समझ लेना गुमराही है। ऐसे लोगों को अल्लाह तआला ने फरमाया कि यह लोग अल्लाह पर झूठ बांधते हैं।
◆ *अल्लाह तआला ﷻ कुरआन पाक (पारा 14 सूरह नहल आयत 116) में इरशाद फरमाता है*
"और न कहो उसे जो तुम्हारी ज़बाने झूठ बयान करती हैं यह हलाल है और यह हराम है कि अल्लाह पर झूठ बांधो बेशक जो अल्लाह पर झूठ बांधते हैं उनका भला न होगा मालूम हुआ कि हलाल व हराम अपनी तरफ से न बनाओ अलावा उन चीज़ों के जिसे अल्लाह ﷻ और उसके रसूल ﷺ ने हराम फरमादिया और यह भी मालूम हुआ कि बिना दलील किसी चीज़ को हराम कह देना अल्लाह तआला पर झूठ है।"
◆जो लोग मिलाद शरीफ की शीरिनी, शबे बरात का हलवा फातिहा के खाने को बिना सबूत व बिना दलील के हराम कहते हैं वह झूठे हैं। यह तमाम चीजें हलाल हैं क्यूंकि इन्हें अल्लाह तआला और उसके रसूल ﷺ ने हराम नही फ़रमाया ! रसूल ﷺ फ़रमाते है हलाल वह जिसे अल्लाह तआला हलाल फरमाये और हराम वह जिसे अल्लाह तआला हराम फरमाये और जिससे खामोशी है वह माफ है।
📔 *(फ़ज़ाईल शब-ए बरात सफ़ह नं 18,19,20,21 )*
*👑मिशन ए आला हज़रत टीम की जानिब से आलमे इस्लाम को शबे बराअत की बहुत बहुत मुबारकबाद👑*
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