मीलाद शरीफ और क़ुर्आन
*🌹🌹🌹🌹रबीउन नूर शरीफ-🌹🌹🌹🌹*
तमाम गुलामाने आशिकाने मदह ख्वाने मुस्तफा को रबीउन नूर शरीफ बहुत बहुत मुबारक हो
*मीलाद शरीफ और क़ुर्आन*
*ⓩ हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की ज़ात व औसाफ व उनके हाल व अक़वाल के बयान को ही मिलादे पाक कहा जाता है,हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की विलादत की खुशी मनाना ये सिर्फ इंसान का ही खास्सा नहीं है बल्कि तमाम खलक़त उनकी विलादत की खुशी मनाती है बल्कि खुद रब्बे क़ायनात मेरे मुस्तफा जाने रहमत सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का मीलाद पढ़ता है,यहां क़ुर्आन की सिर्फ चंद आयतें पेश करता हूं वरना तो पूरा क़ुर्आन ही मेरे आका सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की शान से भरा हुआ है मगर कुछ आंख के अंधे और अक़्ल के कोढ़ियों को ये आयतें नहीं दिखतीं और वो लोग इसको भी शिर्क और बिदअत कहते हैं माज़ अल्लाह,हवाला मुलाहज़ा फरमायें*
*कंज़ुल ईमान* -वही है जिसने अपना रसूल हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा
📕 पारा 10,सूरह तौबा,आयत 33
*कंज़ुल ईमान* -बेशक तुम्हारे पास तशरीफ लायें तुममे से वो रसूल जिन पर तुम्हारा मशक़्क़त में पड़ना गिरां है तुम्हारी भलाई के निहायत चाहने वाले मुसलमानों पर कमाल मेहरबान
📕 पारा 11,सूरह तौबा,आयत 128
*ⓩ पहली आयत में मौला तआला उन्हें भेजने का ज़िक्र कर रहा है और भेजा उसे जाता है जो पहले से मौजूद हो मतलब साफ है कि महबूब सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम पहले से ही आसमान पर या अर्शे आज़म पर या जहां भी रब ने उन्हें रखा वो वहां मौजूद थे,और दूसरी आयत में उनके तशरीफ लाने का और उनके औसाफ का भी बयान फरमा रहा है,क्या ये उसके महबूब सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का मीलाद नहीं है,क्या अब वहाबी खुदा पर भी हुक्म लगायेगा*
*कंज़ुल ईमान* -बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ से एक नूर आया और रौशन किताब
📕 पारा 6,सूरह मायदा,आयत 15
*ⓩ यहां नूर से मुराद हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम हैं और किताब से मुराद क़ुर्आने मुक़द्दस है*
*कंज़ुल ईमान* -और याद करो जब ईसा बिन मरियम ने कहा ................. और उन रसूल की बशारत सुनाता हूं जो मेरे बाद तशरीफ लायेंगे उनका नाम *अहमद* है
📕 पारा 28,सूरह सफ,आयत 6
*ⓩ इस आयत में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम मेरे आक़ा सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का मीलाद पढ़ रहे हैं,क्या अब वहाबी उन पर भी हुक्म लगायेगा*
*कंज़ुल ईमान* -और याद करो जब अल्लाह ने पैगम्बरों से अहद लिया.जो मैं तुमको किताब और हिकमत दूं फिर तशरीफ लायें तुम्हारे पास वो रसूल कि तुम्हारी किताब की तस्दीक़ फरमायें तो तुम ज़रूर ज़रूर उन पर ईमान लाना और उनकी मदद करना,क्या तुमने इक़रार किया और उस पर मेरा भारी ज़िम्मा लिया,सबने अर्ज़ की हमने इक़रार किया फरमाया तो एक दूसरे पर गवाह हो जाओ और मैं खुद तुम्हारे साथ गवाहों में हूं,तो जो कोई इसके बाद फिरे तो वही लोग फासिक़ हैं
📕 पारा 3,सूरह आले इमरान,आयत 81-82
*ⓩ ये आलमे अरवाह का वाकिया है जहां मौला ने अपने महबूब सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की शान बयान करने के लिए अपने तमाम नबियों को इकठ्ठा कर लिया यानि महफिले मिलाद सजा ली और उनसे फरमा रहा है कि अगर तुम्हारे पास मेरा महबूब सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम तशरीफ लायें तो तुम्हे सब कुछ छोड़कर उसकी इत्तेबा करनी होगी,और आखिर के जुम्ले क्या ही क़यामत खेज़ हैं क्या फरमा रहा है कि " जो इस अहद को तोड़े तो वो फासिक़ है " अल्लाह अल्लाह ये कौन कह रहा है हमारा और आपका रब कह रहा है,किससे कह रहा है अपने मासूम नबियों से कह रहा है,क्यों कह रहा है क्योंकि बात उसके महबूब सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की है इसलिए कह रहा है
आज हम उसके महबूब का ज़िक्र करें तो हम मुश्रिक
महफिले मीलाद सजायें तो हम मुश्रिक
भीड़ इकठ्ठा कर लें तो हम मुश्रिक
और रब जो कर रहा है उसका क्या,क्या उस पर भी हुक्म लगेगा वहाबियों
*कंज़ुल ईमान* -और उन्हें अल्लाह के दिन की याद दिला
📕 पारा 13,सूरह इब्राहीम,आयत 5
*ⓩ अल्लाह के दिन से मुराद वो दिन हैं जिस में मौला तआला ने अपने बन्दों पर नेमतें नाज़िल फरमाई जैसा कि बनी इस्राईल पर मन व सल्वा नाज़िल फरमाना और उनको दरिया से पार कराना,जैसा कि खुद हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम का क़ौल क़ुर्आन में मौजूद है मौला फरमाता है कि*
*कंज़ुल ईमान* -ईसा बिन मरियम ने अर्ज़ की ऐ अल्लाह ऐ हमारे रब हम पर आसमान से एक ख्वान उतार कि वो हमारे लिए ईद हो
📕 पारा 7,सूरह मायदा,आयत 114
*ⓩ मुफस्सेरीन फरमाते हैं कि जिस दिन आसमान से ख्वान नाज़िल हुआ वो दिन इतवार का था और आज भी ईसाई उस दिन खुशी यानि छुट्टी मनाते हैं,सोचिये कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ख्वान के नाज़िल होने पर तो ईद का हुक्म नाज़िल फरमा रहे हैं तो क्या माज़ अल्लाह हमारे नबी सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की विलादत एक खाने से भरे तश्त से भी कम है कि हम उस पर खुशी नहीं मना सकते,यक़ीनन मेरे आक़ा सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम दुनियाये जहान की सारी नेमतों से बढ़कर हैं ये मैं नहीं कह रहा बल्कि खुद रब्बे क़ायनात फरमा रहा है,पढ़िये*
*कंज़ुल ईमान* -बेशक अल्लाह का बड़ा एहसान हुआ मुसलमानों पर कि उनमे उन्हीं में से एक रसूल भेजा जो उन पर उसकी आयतें पढ़ते हैं और उन्हें पाक करते हैं और उन्हें किताब और हिक़मत सिखाते है
📕 पारा 4,सूरह आले इमरान,आयत 164
*ⓩ मौला ने इंसान को कैसी कैसी नेमतें अता फरमाई है,उसकी आंख कान नाक मुंह ज़बान दिल जिगर उसके हाथ पैर उसकी सांसें,मैंने शायद किसी मैगज़ीन में पढ़ा था किसी मेडिकल रिसर्चर का बयान है कि एक इंसान के जितने भी आज़ा है वैसे तो उनकी कोई कीमत नहीं सब अनमोल है मगर फिर भी मेडिकल साइंस एक इंसान को तक़रीबन 300 करोड़ रूपये की मिल्क समझती है सुब्हान अल्लाह,हर इंसान 300 करोड़ रूपये का फिर उस पर जो रब ने नेमतें दी उस के मां-बाप भाई-बहन दोस्त-अहबाब नाते रिश्तेदार वो अलग फिर उस पर ये कि उसे ज़िन्दगी गुज़ारने के लिए कितने ही साज़ो सामान से नवाज़ा,मगर कसम उस रब्बे क़ायनात की पूरा क़ुर्आन उठाकर देख लीजिये कि क्या कहीं उसने अपनी किसी भी नेमत पर एहसान जताया हो नहीं बल्कि अगर जताया है तो अपने महबूब सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम को जब बन्दों के दर्मियान भेजा तब जताया है,अब बताईये क्या जिस नेमत को देने पर वो खुद फरमा रहा है कि "मैंने एहसान किया बन्दों पर" ज़रा सोचिये कि कैसी ही अज़ीम नेमत है मेरे मुस्तफा जाने रहमत सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की विलादत,ख्वान के आसमान से आने पर तो ईद मनायी गयी तो फिर मुस्तफा जाने रहमत सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के आने पर ईद मनाना शिर्क कैसे हो गया,जबकि मौला खुद अपनी दी हुई नेमतों का चर्चा करने का हुक्म दे रहा है,फरमाता है*
*कंज़ुल ईमान* -और अपने रब की नेमत का खूब चर्चा करो
📕 पारा 30,सूरह वद्दोहा,आयत 11
*ⓩ क्या महबूबे दो आलम सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम से बढ़कर भी कोई नेमत हो सकती है,नहीं नहीं नहीं और हरगिज़ नहीं,तो हम सुन्नी रब की दी हुई उसी अज़ीम नेमत का चर्चा करते हैं तो हम मुश्रिक कैसे हो गए बल्कि हक़ तो ये है कि जो उसकी दी हुई नेमत का चर्चा नहीं करते वो एहसान फरामोश गद्दार हैं जहन्नम के हक़दार हैं*
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*जैसा कि क़ुर्आन में मौला तआला फरमाता है कि मेरी दी हुई नेअमतों का चर्चा करो तो नेअमते अज़मा के ताल्लुक़ से हज़रत सय्यदना अब्दुल्लाह इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि*
*हदीस* - हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम बेशक अल्लाह की नेअमत हैं
📕 बुखारी,जिल्द 2,सफह 566
*और नेअमत का चर्चा करना यानि उसके महबूब का ज़िक्र करना ही है जिसे उर्फे आम में मीलाद शरीफ कहा जाता है,और ये ऐतराज़ भी सरासर बातिल है कि किसी सहाबी ने हुज़ूर का मीलाद नहीं मनाया,सहाबियों का क़ौल तो आगे पेश करता ही हूं पहले इस पर नज़र डालिये कि खुद मुस्तफा जाने रहमत सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम अपना मीलाद पढ़ रहे हैं,मुलाहज़ा फरमायें*
*हदीस* - हज़रते अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि एक दिन हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम मेंबर पर तशरीफ लायें और फरमाया कि मैं कौन हूं सहाबा ने अर्ज़ की कि आप अल्लाह के रसूल हैं फरमाया कि मैं अब्दुल मुत्तलिब के बेटे का बेटा हूं अल्लाह तआला ने तमाम मखलूक़ को पैदा किया उन सबमे सबसे बेहतर मुझे बनाया फिर मखलूक़ के दो गिरोह किये उसमे भी सबमे बेहतर मुझे रखा फिर उनमे क़बीले बनाये और मुझे सबमे बेहतर क़बीले में रखा फिर उनमे घराने बनाये और मुझे सबसे बेहतर घराने में चुना तो मैं उन सबमे अपनी ज़ात और घराने के ऐतबार से सबसे बेहतर हूं
📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 2,सफह 666
*क्या ये मीलाद नहीं है,और पढ़िये*
*हदीस* - हज़रत सय्य्दना अबु क़तादह रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम हमेशा पीर के दिन रोज़ा रखते थे जब आपसे इसके मुताल्लिक़ पूछा गया तो आप फरमाते हैं कि इस दिन मैं पैदा हुआ
📕 मुस्लिम,जिल्द 1,सफह 821
*ग़ौर कीजिये साल में 52 दोशम्बे होते हैं और हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम हर पीर को रोज़ा रख रहे हैं और फरमाते हैं कि इस दिन मैं पैदा हुआ,बेशक आप पैदा तो 12 रबीउल अव्वल शरीफ दोशम्बे को हुए मगर चुंकि दिन दोशम्बा था इसलिए उस दिन की फज़ीलत तमाम सालों के दिनों पर रख दी गई,खुद खुदा जिनका मीलाद पढ़ रहा है खुद हुज़ूर अपना मीलाद पढ़ रहे हैं और किसने कहा कि सहाबा ने हुज़ूर का मीलाद नहीं पढ़ा,उनका तो दिन रात ही हुज़ूर के ज़िक्र में गुज़रता था उन्हें हमारी तरह हुज़ूर का ज़िक्र करने के लिए मौक़ों की ज़रुरत नहीं पड़ती थी,फिर भी कुछ रिवायात पेश करता हूं*
*हदीस* - हज़रत अता बिन यासर रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि हम अब्दुल्लाह बिन उमर बिन आस रज़ियल्लाहु तआला अन्हु के पास गए और उनसे हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की नात पढ़ने को कहा तो आपने हमें हुज़ूर की नात पढ़कर सुनाई
📕 मिश्कात,जिल्द 2,सफह 520 *हदीस* - खुद हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम मस्जिदे नब्वी शरीफ में मेंबर लगवाते और उस पर हज़रते हस्सान इब्ने साबित रज़ियल्लाहु तआला अन्हु खड़े होकर नबी करीम सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की नात पढ़ते जिसे हुज़ूर और तमाम सहाबा सुना करते
📕 अबु दाऊद,जिल्द 3,सफह 570
*महफिल इकट्ठी करना,मेंबर लगाना,नात पढ़ना सुनना,अगर ये सब मीलाद नहीं है तो फिर मीलाद किसे कहते हैं जाहिल वहाबियों का ये कहना कि सहाबा से हुज़ूर का मीलाद मनाना साबित नहीं है सरासर हिमाक़त और जिहालत है और अगर थोड़ी देर के लिए बक़ौल तुम्हारे मान भी लिया जाए कि सहाबये किराम ने हुज़ूर का मीलाद नहीं मनाया तो भी हमारा नबी का मीलाद मनाना नाजायज़ों हराम कैसे हो गया,क्योंकि बहुत से ऐसे काम है जो सहाबा ने नहीं किये हैं मगर हम करतें हैं और वहाबी भी करता है**
*तिर्मिज़ी शरीफ सियाह सित्तह में से एक मशहूर व मारूफ हदीस की किताब है उसमे हज़रत मुहम्मद बिन ईसा तिर्मिज़ी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु ने जिल्द 2 में 512वां बाब बांधा जिसका नाम रखा ماجاء فى ميلاد النبي صلى الله عليه وسلم सोचिये हदीस की किताबों में तो मिलादुन नबी सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम पर बाब तक मौजूद है और सियाह सित्तह व दीगर किताबों में मिलादुन नबी सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम पर बहुत सी हदीसे पाक दर्ज हैं मगर मैं उन सबको नक़ल ना करके सिर्फ उन किताबों का नाम दर्ज करता हूं,मुलाहज़ा फरमायें*
📕 बुखारी,जिल्द 1,सफह 153
📕 मुस्लिम जिल्द 2,सफह 819-1162
📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 2-3,सफह 201-562
📕 इब्ने माजा,जिल्द 2,सफह 8
📕 अबु दाऊद,जिल्द 5,सफह 176
📕 निसाई,जिल्द 2,सफह 147
📕 बैहक़ी,जिल्द 4,सफह 286
📕 वफाउल वफा,सफह 87
📕 सीरतुन नबविया,जिल्द 1,सफह 158
📕 तारीखे उमम,जिल्द 2,सफह 125
📕 ऐलानुन नुबूवत,सफह 193
📕 अयानुल अस्र,जिल्द 1,सफह 33
📕 अत्तारीख,जिल्द 2,सफह 394
📕 मदारेजन नुबूवत,जिल्द 2,सफह 14
📕 मुहम्मदुर्रसूल अल्लाह,जिल्द 1,सफह 102
*हदीस* - हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के मदीना तशरीफ लाने पर सहाबये किराम ने जुलूस निकाला
📕 बुखारी,जिल्द 2,सफह 496
📕 मदारेजन नुबूवत,जिल्द 2,सफह 93
*हदीस* - आपकी आमद पर औरतें और बच्चे घर की छतों पर चढ़ कर वहीं से या मुहम्मद या रसूल अल्लाह सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का नारा लगाते थे
📕 मुस्लिम,जिल्द 7,सफह 417,किताबुज़ ज़ुहद व रिक़ाक़,हदीस 7522
*हदीस* - सहाबये किराम ने घरों में महफिले मीलाद शरीफ मुनक़्क़िद की और खुद हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम ने उनके लिए दुआ फरमाई
📕 निसाई,जिल्द 2,सफह 310
📕 नूर से ज़हूर तक,सफह 178
हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की विलादत पर झण्डे लगाना हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम की सुन्नत है
📕 मवाहिबुल लदुनिया,जिल्द 1,सफह 148
📕 नूर से ज़हूर तक,सफह 182
हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की विलादत पर इब्लीस लईन चीख चीख कर रोया
📕 अलबिदाया वननिहाया,जिल्द 2,सफह 166
📕 मवाहिबुल लदुनिया,जिल्द 1,सफह 148
*और आज उस लईन की औलाद ये नज्दी वहाबी चीखते चिल्लाते हैं और अवाम को ऐसा गुमराह करते हैं जैसे कि मीलाद शरीफ हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का ज़िक्र ना होकर पता नहीं कौन सा हरामो नाजायज़ काम हो गया है जिस पर इतना बखेड़ा किया जाता है,खैर मैं बात कर रहा था कि अगर कोई काम सहाबा ने ना भी किया होता तब भी क्या वो काम हमारे लिए हराम हो जाता आईये इसका जवाब खुद हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम से पूछ लेते हैं तो जवाब में आप सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम इरशाद फरमाते हैं कि*
*हदीस* - हलाल वो है जो खुदा ने अपनी किताब में हलाल किया और हराम वो है जो खुदा ने अपनी किताब में हराम किया और जिसका कुछ ज़िक्र ना फरमाया वो माफ है यानि उस पर कोई गिरफ्त नहीं
📕 तिर्मिज़ी,जिल्द 1,सफह 206
*शाह अब्दुल अज़ीज़ अलैहिर्रहमा का ये क़ौल तक़रीबन इसी हदीस की तशरीह करता है,फरमाते हैं*
ना करना और चीज़ है और मना करना और चीज़,तो ना करना किसी अम्र खैर की मुमानियत की दलील नहीं हो सकती
📕 तोहफये अस्ना अशरिया,बाब 10,सफह 269
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*रिवायत* - अबु लहब जो कि काफिर था और जिसकी मज़म्मत में सूरह लहब नाज़िल हुई,जब हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम की विलादत हुई तो अबु लहब की बांदी सोबिया ने उसको आकर ये खुशखबरी दी कि तेरे भाई के यहां बेटा पैदा हुआ है इसी खुशी में उसने अपनी बांदी को उंगली के इशारे से आज़ाद कर दिया,बाद मरने के अबु लहब को उसके घर वालों ने ख्वाब में देखा तो हाल पूछा तो कहता है कि मैंने कोई भलाई ना पाई मगर ये कि जब इस उंगली को चूसता हूं जिससे मैंने अपने भतीजे की विलादत की खुशी में अपनी बांदी को आज़ाद किया था तो इससे पानी निकलता है जिससे मुझे राहत मिलती है
📕 उम्दतुल क़ारी,जिल्द 2,सफह 95
📕 फतहुल बारी,जिल्द 9,सफह 118
*सोचिये कि जब अबु लहब जैसे काफिर को मीलाद शरीफ की खुशियां मनाने की बरक़त से फैज़ मिल सकता है तो फिर हम तो उनके मानने वाले उम्मती हैं अगर चे हम बदकार हैं तो क्या हुआ,हैं तो उन्ही के कल्मा पढ़ने वाले,क्या हमें बारगाहे खुदावन्दी से फैज़ ना मिलेगा,मिलेगा और यक़ीनन मिलेगा,रिवायत में आता है कि हज़रत जुनैद बग़दादी रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं*
*रिवायत* - जो कोई अदब व ताज़ीम से महफिले मीलाद में शिरकत करेगा इं शा अल्लाह उसका ईमान सलामत रहेगा
📕 अन्नाएतुल कुब्रा,सफह 24
*और सिर्फ ईमान सलामत नहीं रहता है बल्कि अगर कोई काफिर भी हुज़ूर सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के मीलाद शरीफ में सिद्क़ दिल से शामिल हो जाए या किसी तरह का ताऊन करदे तो कोई बईद नहीं कि मौला उसे ईमान जैसी दौलत से नवाज़ दे,मिसाल के तौर पर ये रिवायत पढ़िये और अपना ईमान ताज़ा कीजिये*
*रिवायत* - हज़रत अब्दुल वाहिद बिन इस्माईल रहमतुल्लाह तआला अलैहि फरमाते हैं कि एक शख्स मिस्र में हर साल महफिले मिलाद मुनक़्क़ीद किया करता था उसके पड़ोस में एक यहूदी रहता था,उस यहुदी की बीवी ने कहा कि क्या बात है कि इस महीने में ये मुसलमान बहुत माल खर्च करता है तो उसने कहा कि इस महीने में उनके नबी की विलादत हुई थी जिसकी खुशी में ये एहतेमाम किया जाता है,तो उसकी बीवी खुश हुई और कहा कि ये मुसलमानों का बहुत अच्छा तरीक़ा है और फिर वो सो गई,रात को ख्वाब देखती है कि एक साहिबे हुस्नो जमाल शख्स उस मुसलमान के घर तशरीफ ले गए हैं उनके साथ एक कसीर जमात भी है ये औरत उनके पीछे पीछे उस मुसलमान के घर में दाखिल हो गयी और एक शख्स से पूछा कि ये कौन बुज़ुर्ग हैं तो फरमाया कि ये अल्लाह के सच्चे रसूल जनाब अहमदे मुज्तबा मुहम्मद मुस्तफा सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम हैं और उनके साथ उनके सहाबा की जमात भी है ये इसलिए हाज़िर हुए हैं कि ये शख्स दिल से हुज़ूर की मुहब्बत में महफिले मीलाद शरीफ मुनक़्क़िद करता है वो औरत बोली कि अगर मैं उनसे बात करना चाहूं तो क्या आप जवाब देंगे तो फरमाया कि बिल्कुल,तो औरत हुज़ूर की बारगाह में हाज़िर हुई तो हुज़ूर ने लब्बैक फरमाया तो कहती है कि आप मुझ जैसी को जवाब से नवाज़ते हैं हालांकि मैं आपके दीन पर नहीं हूं तो आप सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम फरमाते हैं कि बेशक मैंने जान लिया कि तुझको हिदायत मिल चुकी है तो फरमाती है कि आप सच कहते हैं आप साहिबे खुल्क़ हैं मैं गवाही देती हूं कि बेशक आप अल्लाह के सच्चे रसूल हैं,फिर ये अपने घर को लौट आई और अहद किया कि सुबह को जो कुछ उसकी मिल्क है वो सब दीने इस्लाम पर लुटा देगी और हुज़ूर की मीलाद मनायेगी,जब सुबह को आंख खुली तो क्या देखती है कि उसका शौहर उससे पहले ही दावत के कामों में मसरूफ है तो हैरानी से पूछती है कि ये क्या माजरा है तो उसका शौहर कहता है कि रात तुमने इस्लाम क़ुबूल कर लिया तो कहती है कि तुम्हे इसकी खबर कैसे हो गई तो शौहर बोला कि मैं भी तेरे बाद उसी महबूबे दोआलम सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के हाथों पर ईमान ला चुका हूं
📕 मिलादुन नबी,सफह 60
📕 तज़किरातुल वाएज़ीन,सफह 200
*सुब्हान अल्लाह सुब्हान अल्लाह,सोचिये कि उस यहुदी औरत और उसके शौहर को हिदायत यानि ईमान क्यों मिला,क्योंकि वो औरत एक मुसलमान के मीलाद शरीफ मनाने पर सिर्फ खुश हो गयी थी जिसकी बदौलत अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त ने उसे और उसके शौहर को ईमान जैसी दौलत से नवाज़ दिया,और एक आज का बद अक़ीदा वहाबी है जो कि कल्मा उसी नबी का पढ़ता है रोज़ा नमाज़ करता है दाढ़ी रखता है झुब्बा टोपी पहनता है मगर अक़ीदा ऐसा कि काफिरों से बदतर है*
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*फ़ज़ाइले मीलाद शरीफ़*
*रिवायत* - जो शख्स हुज़ूर की मुहब्बत में महफिले मीलाद शरीफ मुनक़्क़िद करता है वो साल भर अमनो अमान से रहता है
📕 बारह माह के फज़ायल,सफह 297
*रिवायत* - जो मीलाद शरीफ की खुशियां मनाते हैं और माल खर्च करते हैं उनके लिए अल्लाह के यहां बेशुमार अज्र है
📕 मदारेजुन नुबूवत,जिल्द 2,सफह 26
*रिवायत* - हज़रत सुल्तान सलाहुद्दीन अय्यूबी अलैहिर्रहमा के बहनोई हज़रत सुल्तान मलिक मुज़फ्फर उद्दीन बिन ज़ैन उद्दीन अलैहिर्रहमा खुद तो 5 दरहम के मामूली कपड़े पहनते मगर हर साल महफिले मीलाद शरीफ पर 3 लाख दीनार खर्च करते और उस महफिले पाक में मुल्क के मुअज़्ज़ज़ उल्मा व सुल्हा इकराम तशरीफ लाते,हाफिज़ अब्दुल खत्ताब बिन दहिया ने 625 हिजरी में मीलाद शरीफ पर एक किताब लिखी जो सुल्तान की महफिल में पढ़ी गयी जिस पर आपने उनको 1000 दीनार नज़राना पेश किया
📕 सीरते नबवी,जिल्द 1,सफह 45
📕 तज़किरातुल अम्बिया,सफह 467
ⓩ 1 दरहम = 3.5 माशा चांदी
1 दिनार = 4.5 माशा सोना
4.5 माशा = 4.375 ग्राम
तो 300000 x 4.375 ग्राम = 1312500 ग्राम
1312500 / 1000 ग्राम = 1312.5 किलोग्राम
मतलब 13 कुंटल साढ़े बारह किलो सोना हर साल खर्च करते अगर आज की सोने की कीमत के हिसाब से जोड़ें तो
3045 रू. पर ग्राम
3045 x 1312500 = 3,99,65,62,500
तकरीबन 400 करोड़ रूपये
*ऐसे होते हैं गुलामाने मुस्तफा,एक बात तो तय है कि इतना पैसा खर्च करने के लिए भी कलेजा चाहिये जो कि सिर्फ सुन्नियों के पास ही मिलेगा किसी वहाबी बद अक़ीदे के पास नहीं,यहां पर कोई एक सवाल पैदा कर सकता है कि चलो मिलाद शरीफ मनाना जायज़ हो सकता है मगर इतना सोना या कसीर रुपया खर्च करने की क्या ज़रूरत है ये तो इसराफ यानि फिज़ूल खर्ची है तो इसका जवाब मेरे आलाहज़रत युं देते हैं और फरमाते हैं कि*
*रिवायत* - एक सालेह ने अपने घर में महफिले मीलाद शरीफ मुनक़्क़िद की और उसमे 1000 शमां रौशन की,एक साहब वहां पहुंचे और ये कैफियत देखकर वापस जाने लगे तो बानिये महफिल ने उनसे हाल पूछा तो कहने लगे कि जो काम 1 शमां से हो सकता था आपने उसके लिए 1000 शमां क्यों रौशन की ये तो इसराफ है,तो वो फरमाते हैं कि अच्छा ठीक है आप जाकर वो शमां बुझा दीजिये जो मैंने गैर खुदा के लिए रौशन की हो वो गये और हर शमां पर फूंक मारकर बुझाते मगर कोई शमां ना बुझती,मालूम हुआ कि महफिले मीलाद शरीफ में जो भी खर्च होता है वो राहे खुदा में ही होता है और जिससे ताज़ीम ज़िक्र शरीफ मक़सूद हो उसमे कितना भी खर्च हो जाये हरगिज़ मना नहीं
📕 अलमलफूज़,हिस्सा 1,सफह 101
*इस मौज़ू पर आलाहज़रत अज़ीमुल बरक़त का लिखा हुआ रिसाला "अकमालुत ताम्मा अलस शिर्किस सवाबिल उमूरिल आम्मा" पढ़ा जाये,जिसमे आपने दलीलों के अंबार लगा दिये और महफिले मीलाद को जायज़ और सुनन साबित फरमाया,मीलाद शरीफ अब वहाबियों का एक फतवा भी पढ़ लीजिये जिसे अज़ीज़ुर्रहमान देवबंदी ने दिया और जिस पर अशरफ अली थानवी की तस्दीक़ भी हुई,लिखते हैं*
*फतवा* - मीलाद शरीफ की महफिल मनाना अगर उसमें बिदअत का दखल ना हो तो जायज़ बल्कि बेहतर है क्योंकि ये भी हुज़ूर के बाक़ी अज़कार की मिस्ल है
📕 फतावा इमदादिया,सफह 320
*पूरी जमाते वहाबियत के ऊपर और एक कहर बरपाती हुई तहरीर पढ़ लीजिये वहाबियों के हकीमुल उम्मत अशरफ अली थानवी के पीरो मुर्शिद हाजी इम्दाद उल्लाह मुहाजिर मक्की लिखते हैं*
*रिवायत* - मशरब फक़ीर का ये है कि महफिले मीलाद में शरीक होता हूं बल्कि ज़रियये बरकात समझ कर हर साल मुनक़्क़िद करता हूं और क़याम में लुत्फ व लज़्ज़त पाता हूं
📕 फैसला हफ्त मसला,सफह 111
*अल्लाहु अकबर पीर मिलाद शरीफ में शरीक होता है बल्कि उसे सलाम पढ़ने में लुत्फ मिलता है और मुरीद हराम और शिर्क का फतवा दे रहा है अल्लाह ही जाने इनके यहां दीन किस चिड़िया का नाम है*
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*अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त क़ुरान में इरशाद फरमाता है कि*
*कंज़ुल ईमान* - ऐ महबूब हमने तुम्हारा ज़िक्र बुलंद किया
📕 पारा 30,सूरह अलम नशरह,आयत 4
*तफसीर* - हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु तआला अन्हु फरमाते हैं कि बुलंद करने से मतलब कि खुदा के हर ज़िक्र के साथ महबूबे दोआलम सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का ज़िक्र मौजूद है चाहे कल्मा हो या अज़ान हो या तक्बीर या नमाज़ गर्ज़ कि कोई भी इबादत महबूब के ज़िक्र से ख़ाली नहीं
📕 तफ़सीर खज़ाएनुल इरफ़ान,सफह 708
*बाज़ फुक़हा फरमाते हैं कि हुज़ूर का ज़िक्र ख़ुदा का ज़िक्र ही है युंही अल्लाह के वलियों का तज़किरा करना भी ख़ुदा का ज़िक्र करना ही है,क़ुराने मुक़द्दस में अल्लाह रब्बुल इज़्ज़त इरशाद फरमाता है कि*
*कंज़ुल ईमान* - ऐ महबूब तुम फरमा दो कि ऐ लोगों अगर तुम अल्लाह को दोस्त रखते हो तो मेरे फरमा बरदार हो जाओ अल्लाह तुम्हे दोस्त रखेगा
📕 पारा 3,सूरह आले इमरान,आयत 31
*मतलब ये कि अगर अल्लाह का क़ुर्ब चाहिए तो मुस्तफा जाने रहमत सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम के क़ुर्ब के बग़ैर नामुमकिन है,रिवायत है कि*
*हदीस* - जो जिससे मुहब्बत रखता है उसका ज़िक्र बहुत करता है
📕 चहल हदीस,सफह 241
*ये है क़ुर्बत की निशानी तो मिलाद शरीफ में हम मुस्तफा जाने रहमत सल्लललाहो तआला अलैहि वसल्लम का ज़िक्र ही तो करते हैं और उनका ज़िक्र गोया खुदा का ज़िक्र है और ज़ाकिर की क्या फज़ीलत है ये भी सुन लीजिए,हदीसे पाक में आता है कि*
*हदीस* - अल्लाह के कुछ फ़रिश्ते ऐसे हैं जिन्हें मौला ने कुछ काम ना दिया सिवाये इसके कि जहां भी उसके बन्दे उसका ज़िक्र कर रहे हों वो उन्हें अपने परों से ढांप लें और उन पर रहमत की बारिश करें,जब वो महफ़िल ख़त्म होती है तो ये फ़रिश्ते ख़ुदा की बारगाह में पहुंचते हैं तो मौला फरमाता है कि ऐ मेरे फरिश्तो कहां से आ रहे हो हालांकि वो सब जानता है फ़रिश्ते अर्ज़ करते हैं कि फलां जगह तेरे बन्दे तेरा ज़िक्र कर रहे थे और तुझसे मांग रहे थे मौला फरमाता है क्या मांग रहे थे कहते हैं कि जन्नत मौला फरमाता है कि क्या उन्होंने जन्नत देखी है अर्ज़ की नहीं तो अगर वो देख लेते तो क्या करते फ़रिश्ते कहते हैं और ज़्यादा आरज़ू करते फिर मौल फरमाता है कि और क्या कर रहे थे कहते हैं और वो जहन्नम से पनाह मांग रहे थे मौला फरमाता है कि क्या उन्होंने जहन्नम देखी है अर्ज़ की नहीं तो अगर वो जहन्नम देख लेते तो क्या करते फ़रिश्ते कहते हैं कि फिर वो उसे और ज़्यादा पनाह मांगते मौला फरमाता है और क्या कर रहे थे कहा कि तेरी बड़ाई बयान कर रहे थे मौला फरमाता है कि क्या उन्होंने मुझे देखा है फ़रमाया नहीं तो अगर मुझे देख लेते तो क्या करते तो कहते हैं कि फिर तेरी और ज़्यादा बड़ाई बयान करते मौला फरमाता है कि ऐ मेरे फरिश्तो गवाह हो जाओ मैंने उन सबको बख्श दिया फ़रिश्ते अर्ज़ करते हैं कि मौला तेरा एक बंदा सिर्फ वहां से गुज़र रहा था उनके साथ बैठ गया मौला फरमाता है कि बेशक मैंने उसको भी बख्श दिया
📕 मुस्लिम बहवाला चहल हदीस,सफह 236
*फिर चाहे वो महफ़िल महफ़िले मिलाद शरीफ हो या ग्यारहवीं शरीफ हो या किसी बुज़ुर्ग का उर्स पाक या यूंही कुछ लोग दीनी महफ़िल सजा लें,सब ज़िक्रुल्लाह में दाख़िल है*
मुहम्म्द अब्दुर रहीम खान
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